ad

loading...

जल्दी करो मेरे छेद से ही डाल लो न...! भाग 1

रेलवे स्टेशन पर भारी भीड़ थी; आने वालों की भी और जाने वालों की भी. तभी स्टेशन पर घोषणा हुई," कृपया ध्यान दें, दिल्ली से मुंबई को जाने वाली न्यू गंगा एक्सप्रेस 24 घंटे लेट है" सुनते ही आशीष का चेहरा फीका पढ़ गया...कहीं घर वाले ढूँढ़ते रेलवे स्टेशन तक आ गए तो... मुंबई के लिए उसने 3 दिन पहले ही आरक्षण करा लिया था...पर घोषणा सुनकर तो उसके सारे प्लान का कबाड़ा हो गया...हताशा में उसने चलने को तैयार खढी एक पस्सेंजेर ट्रेन की सीटी सुनाई दी...हडबडाहट में वह उसकी और भागा...अन्दर घुसने के लिए आशीष को काफी मशक्कत करनी पड़ी...अन्दर पैर रखने की जगह भी मुश्किल से थी...सभी खड़े थे...क्या पुरुष और क्या औरत...सभी का बुरा हाल था और जो बैठे थे; वो बैठे नहीं थे...लेटे थे...पूरी सीट पर कब्ज़ा किये...आशीष ने बाहर झाँका; उसको डर था...घरवाले आकर उसको पकड़ न लें; वापस न ले जाएं उसका सपना न तोड़ दें...हीरो बनने का! हीरो बनने के लिए आशीष घर से भाग कर आया था...शकल सूरत से हीरो ही लगता था कद में अमिताभ जैसा; स्मार्टनेस में अपने सल्मान जैसा...बॉडी में गजनी वाला आमिर खान लगता था और एक्टिंग में शाहरुख़ खान...वो इन सबका दीवाना था...इसके साथ ही हेरोइंस का भी...उसने सुना था...एक बार कामयाब हो जाओ फिर सारी जवान हसीन माडल्स, हीरो और निर्देशक के नीचे ही रहती हैं...बस यही मकसद था उसका हीरो बनने का ...रेल गाढ़ी के चलने पर उसने रहत की सांस ली...हीरोगिरी के सपनों में खोये हुए आशीष को अचानक पीछे से किसी ने धक्का मारा...वो चौंक कर पीछे पलटा..."देखकर नहीं खड़े हो सकते क्या भैया...बुकिंग करा रखी है क्या?"आशीष देखता ही रह गया...गाँव की लगने वाली एक अल्हड़ जवान युवती उसको झाड पिला रही थी...उम्र करीब 22 साल होगी...चोली और घाघरे में ब्याहता लगती थी...छोटे कद की होने की वजह से आशीष को उसकी श्यामल रंग की चूचियां काफी अन्दर तक दिखाई दे रही थी...चूचियों का आकार ज्यादा बड़ा नहीं था, पर जितना था मनमोहक था...आशीष उसकी बातों पर कम उसकी छलकती हुई मस्तियों पर ज्यादा ध्यान दे रहा था...उस अबला की पुकार सुनकर भीड़ से करीब 45 साल के एक आदमी ने सर निकल कर कहा,"कौन है बे?" पर जब आशीष के डील डौल को देखा तो उसका सुर बदल गया,"भाई कोई मर्ज़ी से थोड़े ही किसी के ऊपर चढ़ना चाहता है..." उसकी बात पर सब ठाहाका लगाकर हंस पडे...तभी भीड़ से एक बूढ़े की आवाज आई," कृष्णा! ठीक हो बेटी "पल्ले से सर ढकते उस 'कृष्णा ' ने जवाब दिया," कहाँ ठीक हूँ बापू!" और फिर से बद्बदाने लगी," अपने पैर पर खड़े नहीं हो सकते क्या?"आशीष ने उसके चेहरे को देखा...रंग गोरा नहीं था पर चेहरे के नयन-नक्श तो कई हीरोइनों को भी मात देते थे...गोल चेहरा, पतली छोटी नाक और कमल की पंखुड़ियों जैसे होंट...आशीष बार-बार कन्खियों से उसको देखता रहा...तभी कृष्णा ने आवाज लगायी,"रानी ठीक है क्या बापू? वहां जगह न हो तो यहाँ भेज दो...यहाँ थोड़ी-सी जगह बन गयी है..."और रानी वहीं आ गयी...कृष्णा ने अपने और आशीष के बीच रानी को फंसा दिया...रानी के गोल मोटे चूतड आशीष की जांघों से सटे हुए थे...ये तो कृष्णा ने सोने पर सुहागा कर दिया...अब आशीष कृष्णा को छोड़ रानी को देखने लगा...उसके लट्टू भी बढे-बढे थे...उसने एक मैली सी सलवार-कमीज डाल राखी थी...उसका कद भी करीब 5' 2" होगा... कृष्णा से करीब 2" लम्बी! उसका चहरा भी उतना ही सुन्दर था और थोड़ी सी लाली भी झलक रही थी...उसके जिस्म की नक्काशी मस्त थी...कुल मिला कर आशीष को टाइम पास का मस्त साधन मिल गया था...रानी कुंवारी लगती थी...उम्र से भी और जिस्म से भी...उसकी छातियाँ भारी-भारी और कसी हुई गोलाई लिए हुए थी...नितम्बों पर कुदरत ने कुछ ज्यादा ही इनायत बक्षी थी...आशीष रह-रह कर अनजान बनते हुए उसकी गांड से अपनी जांघें घिसाने लगा...पर शायद उसको अहसास ही नहीं हो रहा था...या फिर क्या पता उसको भी मजा आ रहा हो!अगले स्टेशन पर डिब्बे में और जनता घुश आई और लाख कोशिश करने पर भी कृष्णा अपने चारों और लफ़ंगे लोगों को सटकर खड़ा होने से न रोक सकी...उसका दम घुटने सा लगा...एक आदमी ने शायद उसकी गांड में कुछ चुभा दिया...वह उछल पड़ी...क्या कर रहे हो?दिखता नहीं क्या?""ऐ मैडम; ज्यास्ती बकवास नहीं मारने का;ठंडी हवा का इतना इच शौक पल रैल्ली है...तो अपनी गाड़ी में बैठ के जाने को मांगता था..."आदमी बिघढ़ कर बोला और ऐसे ही खड़ा रहा...कृष्णा एकदम दुबक सी गयी...वो तो बस आशीष जैसों पर ही डाट मार सकती थी...कृष्णा को मुश्टंडे लोगों की भीड़ में आशीष ही थोडा शरीफ लगा...वो रानी समेत आशीष के साथ चिपक कर कड़ी हो गई, जैसे कहना चाहती हो,"तुम ही सही हो, इनसे तो भगवन बचाए!"आशीष भी जैसे उनके चिपकने का मतलब समझ गया;उसने पलट कर अपना मुंह उनकी और कर लिया और अपनी लम्बी मजबूत बाजू उनके चारों और बैरियर की तरह लगा दी...कृष्णा ने आशीष को देखा;आशीष थोड़ी हिचक के साथ बोला,"जी उधर से दबाव पड़ रहा है...आपको परेशानी ना हो इसीलिए अपने हाथ सीट से लगा लिए..."कृष्णा जैसे उसका मतलब समझी ही ना हो...उसने आशीष के बोलना बंद करते ही अपनी नजरें हटा ली...अब आशीष उसकी चुचियों को अन्दर तक और रानी की चूचियों को बहार से देखने का आनंद ले रहा था...कृष्णा ने उनको अब आशीष की नजरों से बचने की कोशिश भी नहीं की..."कहाँ जा रहे हो?..."कृष्णा ने लोगों से बचने के लिए धन्यवाद् देने की खातिर पूछ लिया..."मुंबई"आशीष उसकी बदली आवाज पर काफी हैरान ठा..."और तुम?""भैया जा तो हम भी मुंबई ही रहे हैं...पर लगता नहीं की मुंबई तक पहुँच पायेंगे...!"कृष्णा अब मीठी आवाज में बात कर रही थी..."क्यूँ ?"आशीष ने बात बाधा दी!"अब इतनी भीड़ में क्या भरोसा!"मैंने कहा है बापू को जयपुर से तत्काल करा लो; पर वो माने तब न!""भाभी!बापू को ऐसे क्यूँ बोलती हो?"

No comments :

Post a Comment