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चार होंठ दो ऊपर और दो नीचे भाग 2

अच्छा चलो अब सो ही जाते हैं। पर एक समस्या है?" "वो क्या?" "दरअसल मैं सोने से पहले दूध पीता हूँ।" "ये क्या समस्या है, रसोई में जाकर पी लो।" "वो... वो... रसोई में लाईट नहीं है ना। बिना लाईट के मुझे डर लगता है।" "ऐसे तो बड़े शेर बनते हो।" "तुम भी तो झाँसी की शेरनी हो, तुम ही ला दो ना।" "मैं.. मैं... " इतने में ज़ोर की बिजली कड़की और निशा डर के मारे मेरी ख़िसक आई "मुझे भी अँधेरे से डर लगता है।" "हे भगवान इस प्यासे को कोई मदद नहीं करना चाहता" मैंने तड़पते हुए मजनू की तरह जब शीशे पर हाथ रख एक्टिंग की तो निशा की हँसी निकल गई। "मैं क्या मदद कर सकती हूँ?" उसने हँसते हुए पूछा "तुम अपना ही पिला दो।" "क्या मतलब?" उसने झट से अपना हाथ अपने उरोजों पर रख लिए "जीजू तुम फिर...?" इतने बड़े अमृत-कलशों में दूध भरा पड़ा है थोड़ा सा पिला दो ना तुम्हारा क्या बिगड़ जाएगा" मैंने लगभग गिड़गिड़ाने के अन्दाज़ में कहा। तो निशा पहले तो हँस पड़ी फिर नाराज़ होकर बोली,"जीजू तुम हद पार कर रहे हो।" "अभी पार कहाँ की है तुम कहाँ पार करने दे रही हो?" "जीजू मुझे नींद आ रही है" उसने आँखें तरेरते हुए कहा। "हे भगवान क्या ज़माना आ गया है। कोई किसी की मदद नहीं करना चाहता।" निशा हँसते हुए जा रही थी। मैंने अपनी एक्टिंग करनी जारी रखी "सुना है झाँसी के लोगों का दिल बहुत बड़ा होता है पर अब पता चला कि बड़ा नहीं पत्थर होता है और पत्थर ही क्या पूरा पहाड़ ही होता है, टस से मस ही नहीं होता, पिघलता ही नहीं।" निशा हँसते-हँसते दोहरी होती जा रही थी। पर मेरी ऐक्टिंग चालू थी। "हे भगवान, इन ख़ूबसूरत लड़िकयों का दिल इतना पत्थर का क्यों बनाया है, इससे अच्छा तो इन्हें काली-कलूटी ही बना देता कम से कम किसी प्यासे पर तरस तो आ जाता।" मैंने अपनी ऐक्टिंग चालू रखी। मैं तो शोले वाला वीरू ही बना था "जब कोई दूध का प्यासा मरता है तो अगले जन्म में वो कनख़जूरा या तिलचट्टा बनता है। हे भगवान, मुझे कनख़जूरा या तिलचट्टा बनने से बचा लो। हे भगवान मुझे नहीं तो कम से कम इस झाँसी की रानी को ही बचा लो।" "क्या मतलब?" "सुना है दूध के प्यासे मरते व्यक्ति की बददुआ से वो कंजूस लड़की अगले जन्म में जंगली बिल्ली बनती है। और इस ज्न्म में उसकी शादी २४वीं साल ही हो जाती है और अगले ३ सालों में ६ बच्चे भी हो जाते हैं।" मैंने आँखें बन्द किए अपने दोनों हाथ ऊपर फैलाए। हँसते-हँसते निशा का बुरा हाल था। वो बोली "३ साल में ६ बच्चे... वो कैसे?" मेरे कार्यक्रम की तो अब बस चंद लाईनें ही लिखनीं बाकी रह गई थीं। चिड़िया ने दाना चुगने के लिए जाल की ओर बढ़ना शुरु कर दिया था। मैंने कहा "अच्छा सच्चे आशिक़ की दुआ हो और भगवान की मर्ज़ी हो तो सबकुछ हो सकता है। हर साल दो-दो जुड़वाँ बच्चे पैदा हो सकते हैं।" निशा ठहाके मारने लगी थी। हँसते-हँसते वो दोहरी होती जा रही थी। मैंने कहा चलो दूध नहीं पिलाना, ना सही, पर कम से कम एक बार दूध-कलश देख ही लेने दो।" "देखने से क्या होगा?" "मुझे तसल्ली हो जाएगी... एक झलक दिखाने से तुम्हारा क्या घिस जाएगा, प्लीज़ एक बार।" "ओह... जीजू तुम भी ना... नहीं... ओह... तुम भी ........., मुझे अपनी बातों के जाल में फिर उलझा ही लिया ना, मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी है।" "अरे किसी की प्यास बुझाने से पुण्य मिलता है।" निशा अब पूरी तरह से गरम हो चुकी थी। उसके मन में कशमकश चल रही थी कि आगे बढ़े या नहीं। मैं जानता हूँ पहली बार की चुदाई से सभी डरतीं हैं। और वो तो अभी अनछुई कुँवारी कली थी। पर मेरा कार्यक्रम बिल्कुल सम्पूर्ण था। मेरे चुंगल से वो भला कैसे निकल सकती थी। उसने आँखें बन्द कर रखीं थीं। फिर धीरे से बोली "बस एक बार ही देखना है और कोई शैतानी नहीं समझे?" "ठीक है बस एक बार एक मिनट और २० सेकेण्ड के लिए, ओके, पक्का... प्रॉमिस... सच्ची..." मैंने अपने कान पकड़ लिए। उसकी हँसी निकल गई। मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। कमोबेश यही हालत निसा की भी थी। उसने काँपती आवाज़ में कहा "अच्छा पहले लाईट बन्द करो, मुझे शर्म आती है।" ओह... अँधेरे में क्या दिखाई देगा? और फिर वो जंगली बिल्ली आ गई तो?" "ओह.. जीजू.. .तुम भी..." इस बार उसने एक नम्बर का बदमाश नहीं कहा। और फिर उसने आँखें बन्द किए हुए ही काँपते हाथों से अपना टॉप थोड़ा सा उठा दिया... उफ्फ... सिन्दूरी आमों जैसे दो रस-कूप मेरे सामने थे। ऐरोला कोई कैरम की गोटी जितना गुलाबी रंग का। घुण्डियाँ बिल्कुल तने हुए चने के दाने जितने। मैं तो बस मंत्रमुग्ध हो देखता ही रह गया। मुझे लगा जैसे मिक्की ही मेरे सामने बैठी है। उसके रस-कूप मिक्की से थोड़े ही बड़े थे पर थोड़े से नीचे झुके, जबकि मुक्की के बिल्कुल सुडौल थे. मैंने एक हाथ से हौले से उन्हें छू दिया। उफ्फ... क्या मुलायम नाज़ुक रेशमी अहसास था। जैसे ही मैंने उनपर अपनी जीभ रखी तो निसा की एक मीठी सी सीत्कार निकल गई। "ओह जीजू... केवल देखने की बात हुई थी... ओह... ओह... यहा... अब... बस करो... मुझे से नहीं रुका जाएगा..." मैंने एक अमृत कलश पर जीभ रख दी और उसे चूसना चालू कर दिया। निशा की सीत्कार अब भी चालू थी। "ओह... जी... जू.... मुझे क्या कर दिया तुमने... ओह.. चोदो मुझे... आह। हाआआयय्य्ययय... ऊईईईईईई... माँ........ आआआहहहह... बस अब ओर नहीं, एक मिनट हो गया है" उसने मेरे सिर के बालों को अपने दोनों हाथों में ज़ोर से पकड़ लिया और अपनी छाती की ओर दबाने लगी। मैं कभी एक उरोज को चूसता, कभी दूसरे को। वो मस्त हुई आँखें बन्द किए मेरे बालों को ज़ोर से खींचती सीत्कार किए जा रही थी। इसी अवस्था में हम कोई ८-१० मिनट तो ज़रूर रहें होंगे। अचानक उसने मेरा सिर पकड़ कर ऊपर उठाया और मेरे होंठों को चूमने लगी, जैसे वो कई जन्मों की प्यासी थी। हम दोनों फ्रेंच किस्स करते रहे। फिर उसने मुझे नीचे ढकेल दिया और मेरे ऊपर लेट कर मेरे होंठ चूसने लगी। मेरा पप्पू तो अकड़ कर कुतुबमीनार बना पाजामे में अपना सिर फोड़ रहा था। मैं उसकी पीठ और नितम्बों पर हाथ फेर रहा था। क्या मुलायम दो ख़रबूज़े जैसे नितम्ब, कि किसी नामर्द का भी लंड खड़ा कर दे। मैंने उसकी गहरी होती खाई में अपनी उँगलियाँ फिरानी शुरु कर दी। उसकी चूत से रिसते कामरस से गीली उसकी चूत और गाँड का स्पर्श तो ऐसा था जैसे मैं स्वर्ग में ही पहुँच गया हूँ। कोई ५ मिनट तक तो उसने मेरे होंठ चूसे ही होंगे। वैसे ही जैसे उस ब्लैक फॉक्स ने उस १५-१६ साल के लड़के के चूसे थे। फिर वो थोड़ी सी उठी और मेरे सीने पर ३-४ मुक्के लगा दिए। और बोली "जीजू तुमने आख़िर मुझे ख़राब कर ही दिया ना!" मैंने धीरे से कहा "ख़राब नहीं प्यार करना सिखाया है" थोड़ी देर बाद पता चलेगा' पर मैंने कहा "अरे छोड़ो इन बातों को जवानी के मज़ा लो, इस रात को यादगार रात बनाओ" "नहीं जीजू, यह ठीक नहीं होगा। मैं अभी तक कुँवारी हूँ। मैंने पहले किसी के साथ कुछ नहीं किया। मुझे डर लग रहा है कोई गड़बड़ हो गई तो?" "अरे मेरी रानी अब इतनी दूर आ ही गए हैं तो डर कैसा तुम तो बेकार डर रही हो, सभी मज़ा लेते हैं। इस जवानी को इतना क्यों दफ़ना रही हो। अपने मन और दिल से पूछो वो क्या कहता है।" मैंने अपना राम-बाण चला दिया। मैं जानता था वो पूरी तरह तैयार है पर पहली बार है इसलिए डर रही है। मन में हिचकिचाहट है। मेरे थोड़े से उकसावे पर वह चुदाई के लिए तैयार हो जाएगी। चूत और दिल इसके बस में अब कहाँ हैं, वो तो कब के मेरे हो चुके हैं। बस ये जो दिमाग में थोड़ा सा खलल है, मना कर रहा है। मेरी परियोजना का अन्तिम भाग सफलता पूर्वक पूरा हो गया था। अब तो बस उत्पाद का उदघाटन करना था। मैंने उसका टॉप उतार दिया। दोनों क़बूतर आज़ाद हो गए। वो आँखें बन्द करके लेटी थी। होंठ काँप रहे थे। मैंने अभी तक उसकी चूत को हाथ भी नहीं लगाया था। आप तो जानते हैं मैं प्रेम गुरु हूँ और जल्दीबाज़ी में विश्वास नहीं रखता हूँ। मैं तो उसके मुँह से कहलवाना चाहता था कि 'मुझे चोदो'। अब मैंने उसके होठों पर उसके होंठ रख दिए। उसके नरम नाज़ुक रसीले होठ नहीं जैसे शहद से भरी फूलों की पँखुड़ियाँ हों। मैंने उसे गालों पर, पलकों पर, माथे पर, गले पर, कान पर, दोनों उरोजों पर, और नाभी पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी। वो आआहहह... उहहहह... करती जा रही थी। अपने पैर पटक रही थी। उसकी सीत्कार तेज़ होती जा रही थी। वो बोली "ये मुझे क्या होता जा रहा है..." वो रोमांच से काँप रही थी। मैं जानता था अब वह झड़ने वाली है। अरे वो तो बिल्कुल कच्ची कली ही निकली। उसका शरीर अकड़ा और उसने मेरे होंठ ही काट लिए। उसके नाखून मेरी पीठ पर चुभ रहे थे। उसने एक हल्की सी सिसकारी मारी। लगता है उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया। फिर वह ठंडी पड़ गई। मैंने अपने कपड़े उतार दिए। सिर्फ चड्डी पहनी रखी। पप्पू महाराज ने अपना सिर चिपकी हुई चड्डी से भी बाहर निकाल ही लिया। उस बेचारे के क्या दोष था। अब निशा की बेल-बॉटम हटाने का वक्त आ गया था। निशा आँखें बन्द किए लेटी थी। मैंने उसकी सैलेक्स (सूती के पाजामे जैसी) के इलास्टिक को धीरे-धीरे नीचे करना शुरु किया। (उसने फिर बत्ती बन्द करने को कहा, तो मैंने कहा कि वो जंगली बिल्ली आ गई तो तुम्हारा दूध पी जाएगी और मैं भूखा ही रह जाऊँगा, रहने दो।) निशा ने अपने चूतड़ थोड़े से ऊपर कर दिए। प्यारे पाठकों, और पाठिकाओं ! अब तो स्वर्ग का द्वार बस एक दो इंच ही रह गया था। चूत का अनावरण होने ही वाला था। मेरा पप्पू तो ठुमके पर ठुमका लगा रहा था। उसने तीन-चार वीर्य की पहली बूँदें छोड़ ही दीं। वो तो इस स्वर्ग के द्वार के दर्शन के लिए कब से बेताब़ था।पहले छोटे-छोटे रेशमी बाल (उन्हें झाँट तो कतई नहीं कहा जा सकता) नज़र आए, और फिर किशमिश का दाना और फिर दो भागों में बँटी हुई उसकी नाज़ुक सी मक्खन मलाई सी चूत की फाँकें। गुलाबी रंगत लिए हुए। चूत के दोनों होठों पर हल्के-हल्के बाल। बीच में हल्की चॉकलेटी रंग की मोटी सी दरार। चीरे की लम्बाई ३ इंच से ज़्यादा बिल्कुल नहीं थी। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ, ऊपर और नीचे के होंठों में रत्ती फर भी फ़र्क नहीं था। मोटे-मोटे गुलाबी रंग के संतरे की फाँके हों जैसे। दाईं जाँघ पर वो काला तिल। जैसे मेरे कत्ल का पूरा इन्तज़ाम किए हो। उसकी चूत काम-रस से सराबोर नीम गीली थी। मैंने अपने हाथों की दोनों उँगलियों से उसकी चूत की दोनों पंखुड़ियों को धीरे से चौड़ा किया। एक हल्की सी 'पट' की आवाज़ के साथ एक गहरा सा चीरा खुल गया। उफ्फ.. सुर्ख लाल पकौड़े जैसी चूत एक दम गुलाबी रंग की थी। ऊपर अनार दाना, उसके नीचे मूत्र-छिद्र माचिस की तीली की नोक जितना बड़ा। आईला... और उसका फिंच... स्स्स्सी... का सिस्कारा तो कमाल का होगा। एक बार मूतते हुए ज़रूर चुम्मा लूँगा. मूत्र-छिद्र के ठीक एक इंच नीचे स्वर्ग-गुफ़ा का छोदा सा बन्द द्वार जिसमें से हल्का-हल्का सा सफेद पानी झर रहा था। मैंने अपनी जीभ जैसी ही उसकी मदन-मणि के दाने पर रखी तो उसकी एक सीत्कार निकल गई। मैंने जीभ को उसके मूत्र-छिद्र पर फिराया और फिर उसके स्वर्ग-द्वार पर। कच्चे नारियल, पेशाब और पसीने जैसी मादक सुगन्ध मेरे नथुनों में भर गई। कुछ मीठा, खट्टा, नमकीन सा स्वाद, निशा तो अब किलकारियाँ मारने लगी थी। उसने अपने नितम्ब ऊपर-नीचे उठाते हुए अपनी चूत मेरे मुँह से चिपका दीं। मेरे सिर को दोनों हाथों से ज़ोर से पकड़ लिया और ज़ोर से बाल नोच लिए। इसमें उस बेचारी का क्या दोष। मुझे लगा अगर यही हालत रही तो मैं जल्दी ही गंजा हो जाऊँगा। पर अगर ऐसी चूत के लिए गंजा भी होना पड़े तो कोई ग़म नहीं। उसने उत्तेजना में अपने पाँव ऊपर उठा लिए और मेरे गले के गिर्द लिपट दिए ज़ोर से। मैंने उसकी पूरी की पूरी चूत को अपने मुँह में भर लिया था, वह थी भी कितनी, एक छोटे परवल या सिंघाड़े जितनी ही तो थी। मैंने उसे ज़ोर से चूसा तो निशा ने इतनी ज़ोर की किलकारी मारी कि अगर बाहर तेज़ बारिश और बिजली नही कड़क रही होती तो पड़ोस वाले अवश्य ही सुन लेते। उसके साथ ही उसकी चूत ने कोई ३-४ चम्मच शहद जैसे मीठे नमकीन खट्टे नारियल पानी और पेशाब की मिली-जुली सुगन्ध जैसे काम-रस छोड़ दिया जिससे मेरा मुँह लबालब भर गया। सही मायने में निशा का यह पहला स्खलन था। मैं तो उसे चटकारे लेकर पी ही गया।
  
निशा बेसुध सी आँखें बन्द किए लेटी थी। थोड़ी देर बाद उसने अपनी जाँघों की कैंची ढीली की और मेरा सिर पकड़ कर ऊपर की ओर सरकाया और अपने होंठ मेरे होंठों पर रखकर चूसने लगी। २-३ मिनट चूसने के बाद वो बोली "जीजू मुझे पता नहीं ये क्या होता जा रहा है। एक मदहोशी सी छा रही है। कुछ करो ना... उफ्फ... हाय्य्य्यययय..." एक ज़ोर की सीत्कार उसने ली। लगता था वो एक बार फिर झड़ गई है। मैं उसके ऊपर आ गया। मैंने अपनी चड्डी फाड़ फेंकी। मेरा ७" का पप्पू आज तो लोहे की तरह सख़्त था। उसकी लम्बाई आधा इंच बढ़कर ७.५ इंच हो गई थी। मैंने कहा "क्या करूँ मेरी जान?" "ओह... जीजू... अब मत तरसाओ... कर लो अपने मन की। ओह आप मेरे मुँह से क्या सुनना चाहते हैं। मुझे शर्म आती है। प्लीज़..." कुछ ना कहते हुए भी उसने सबकुछ कह दिया था। मैंने अपने लंड को उसकी चूत पर लगा दिया। "ऊईईईई... माँआआ.... ओहहहह... जीजू वो... वो... निरोध (कॉण्डोम) तो लगा लो" निशा की आवाज़ काँप रही थी। "मेरी रानी निरोध से मज़ा नहीं आएगा।" "पर वो... वो... अगर मैं गर्भवती हो गई तो...?" "मेरी जान फिर तुम्हारा नया उत्पाद किस दिन काम आएगा? सिर्फ एक महीने में एक गोली?" मैंने कहा, और मन में सोचा 'साली मुझे पपलू समझती है।' "ओह... जीजू, तुम भी एक नम्बर के बदमाश हो..." और उसने मुझे कससकर अपनी बाँहों में भर लिया। "नहीं, मैं .......................... "क्या मतलब?" "वो बाद में अभी तो मज़ा लो।" और मैंने तकिये के नीचे से वैसलीन की डिब्बी से थोड़ी से वैसलीन निकाली और अपने लंड और निशा की चूत में एक उँगली भर कर गच्च से डाल दी। उसकी हल्की सी चीख निकल गई। मैंने ५-७ बार उँगली अन्दर-बाहर की। हे भगवान, साली की क्या मस्त सँकरी चूत है। एकदम कच्ची कली जैसी, फ़कत कुँवारी, कोरी रसमलाई जैसी। अब देर करना ठीक नहीं था। मैंने अपने पप्पू को उसकी चूत के मुहाने पर रका और उसकी कमर के नीचे एक हाथ डाला। उसके होंठों को अपने मुँह में भर लिया और फिर एक ही झटके में ३ इंच लंड अन्दर ठोंक दिया। निशा की घुटी-घुटी चीख निकल गई। मैं तो प्रेम-गुरु था। मुझे पता था वो ज़रूर चीखेगी, इसीलिए मैंने उसके होंठों को अपने मुँह में ले रखा था। और उसकी कमर पकड़ रखी थी ताकि वो उछल कर मेरा काम ख़राब ना कर दे। अभी धक्के मारने का समय नहीं हुआ था। कोई २-३ मिनट के बाद जब उसकी चूत कुछ आराम में आई और उसने पानी छोड़ा तब मैंने हौले-हौले धक्के लगाने शुरु किए पर अभी लंड पूरा नहीं घुसाया। मुझे पता था, अभी एक बाधा और बाक़ी है - उसकी झिल्ली उसकी सील उसकी नाज़ुक झिल्ली, उसकी कुँवारीच्छद। जिसके फटने का दर्द वो मुश्किल से सहन कर पाएगी। पर उसे भी तोड़ना था। मैंने उसके नितम्बों पर हाथ फेरना चालू रखा। उसकी गाँड के छेद से जैसे ही मेरी उँगलियाँ टकराईं तो मैं तो रोमांच से भर उठा. बालों की कंघी के दाँत जैसी गाँड की तीख़ी नोकदार सिलवटों वाला छेद। आहहहह... क्या मस्त क़यामत है साली की गाँड की छेद मैंने उसके नितम्बों के नीचे एक तकिया और लगा दिया और अपना एक हाथ उसकी पतली कमर के नीचे डाल कर पकड़ लिया। अपने होंठ उसके होंठों पर रख करक उन्हें चूमा और फिर दोनों होंठ अपने मुँह में भर लिए। वो तो पूरी गरम और मस्त हो चुकी थी। उसने तो अब नीचे से हल्के-हल्के धक्के भी लगाने शुरु कर दिए थे। मैंने अपना लंड थोड़ा सा बाहर निकाला और एक ज़ोरदार धक्का लगा दिया। धक्का इतना ज़बर्दस्त था कि उसकी सील को तोड़ता हुआ गच्च से जड़ तक उसकी चूत में समा गया। निशा की घुटी-घुटी चीख़ बाहर कड़कड़ाती बिजली की आवाज़ में दब गई। वो दर्द के मारे छटपटाने लगी। उसने मेरी पीठ पर अपने नाखून इतने ज़ोर से गड़ाए कि मेरी पीठ पर भी ख़ून छलक आया। उसकी चूत से ख़ून का फव्वारा छूटा और मेरे लंड को भिंगोता हुआ तकिए पर गिरने लगा। निशा की कसमसाहट से उसके होंठ मेरे मुँह से निकलते ही वो ज़ोर से चीख़ी "ओईईईईई... माँ.... मर... गईईईईईईईई..." और उसकी आँखों से आँसू निकलने लगे। मैंने उससे कहा "बस मेरी रानी अब दर्द खत्म ! अब तो बस आनन्द ही आनन्द है। बस अब चुप करो" मैंने उसके नमकीन स्वाद वाले आँसूओं पर अपनी जीभ रख दी। "जीजू आप भी एक नम्बर के कसाई हो, मुझे मार ही डाला... ओओईईईईई... निकाल बाहर.. मैं मर जाऊँगी... उईईईईई माँआआआआ...." वो रोए जा रही थी। मैं जानता ता ये दर्द ३-४ मिनट का है बाद में तो बस मज़े ही मज़े। मेरा पप्पू तो जैसे निहाल ही हो गया। इतनी कसी हुई चूत तो मधु की भी नहीं लगी थी, सुहागरात में। कोई ५ मिनट के बाद निशा कुछ संयत हुई। उसकी चूत ने भी फिर से रस छोड़ना चालू कर दिया। मैंने उसकी कपोलों, होंठों और माथे पर चुम्बन लेने शुरु कर दिए। फिर मैंने उससे पूछा "क्यों मेरी मैना, अब दर्द कैसा है?" तो वह बोली "जीजू आपने तो मेरी जान ही निकाल दी, कोई कुँवारी लड़की को ऐसे चोदता है?" "देखो अब जो होना था हो गया हा, अब तो बस इसके आगे स्वर्ग का सा आनन्द ही आनन्द है" और मैंने हौले-हौले धक्के लगाने शुरु कर दिए। निशा को भी अब थोड़ा मज़ा आने लगा था। मैंने कहा "मेरी मैना, अब तुम कली से फूल बन गई हो और मैं तुम्हारा मिट्ठू" निशा की हँसी निकल पड़ी और उसने २-३ मुक्के मेरी पीठ पर लगाते हुए कहा "तुम पूरे एक नम्बर के बदमाश हो। अपने शब्द जाल में फँसा कर आख़िर मुझे ख़राब कर ही दिया।" मैंने एक धक्का और लगाया तो वह चिहुँकी "ओईईई... आआहह... या... ओह अब रूको मत ऐसे ही धक्के लगाओ... आहहह... या.. ओई... मैं तो गईईईईईईई...." और उसके साथ ही वो एक बार फिर झड़ गई। मैं तो जैसे स्वर्ग में था। मैंने लगातार ८-१० धक्के और लगा दिए। अब तो उसकी चूत से फच्च-फच्च का मधुर संगीत बजने लगा था। ये सिलसिला कोई २० मिनट तो ज़रूर चला होगा। मेरा पप्पू बेचारा कब तक लड़ता। आख़िर उसको भी शहीद होना ही था। मैंने दनादन ५-७ धक्के और लगा दिए। निशा भी फिर से झड़ने के कगार पर ही तो थी। और फिर... एक.. दो... तीन चार... पाँछ.. पता नहीं कितनी पिचकारियाँ मेरे पप्पू ने छोड़ दीं... निशा ने मुझे कस कर पकड़ लिया और उसकी चूत ने भी काम-रज छोड़ दिया। उसकी बाँहों में लिपटा मैं कोई १० मिनट उसके ऊपर ही पड़ा रहा। १० मिनट के बाद निशा जैसे नींद से जागी। मैं उठ कर बैठ गया। निशा भी मेरी ओर सरक आई। उसने मेरे होंठों पर दो-तीन चुम्बन ले लिए। मैंने उस से थैंक यू कहा तो उसने कहा "गन्दे बच्चे मेरे प्यारे मिट्ठू..." और मेरी नाक पकड़ कर ज़ोर से दबा दी। मेरे तीसरे उत्पाद की लाँचिंग की ये बधाई ही तो थी। मैं उसे गोद में उठा कर बाथरूम की ओर ले जाने लगा। उसने अपनी बाँहें मेरे गले में डाल दी और आँखें बन्द कर लीं। मैंने देखा पूरा तकिया मेरे वीर्य, निशा के ख़ून, और काम-रज़ से भीगा हुआ था। मैंने एक हाथ से उस तकिए को उल्टा कर दिया ताकि निशा इतना ख़ून देखकर डर ना जाए। निशा पॉट पर बैठकर पेशाब करने लगी। आहहहह... फिच्च... स्स्स्सीईईई... का वो सिसकारा और मूत की पतली धार तो मिक्की जैसी ही थी। मैं तो मन्त्र-मुग्ध सा बस उस नज़ारे को देखता ही रह गया। पॉट पर बैठी निशा की चूत ऐसी लग रही थी जैसे किसी ने मोटे शब्दों में अंग्रेज़ी में 'W' (डब्ल्यू) लिख दिया हो। उसकी चूत ऐसी लग रही थी जैसे एक छोटा करेला किसी ने छील कर बीच में से चीर दिया हो। चूत के होंठ सूजकर पकौड़े जैसे हो गए थे। बिल्कुल लाल गुलाबी। उसकी गाँड का भूरा और कत्थई रंग का छोटा सा छेद खुल और बन्द हो रहा था। मुझे अपने चौथे उत्पाद की याद आ गई... अरे भाई लंड भी तो चुसवाना था ना। मैंने उससे कहा "एक मिनट रूको, मूतना बन्द करो और उठो... प्लीज़ जल्दी" "क्या हुआ?" निशा ने मूतना बन्द कर दिया और घबरा कर बीच में ही खड़ी हो गई। मैंने उसे अपनी ओर खींचा। मैं घुटनों के बल बैठ गया और उसकी चूत को दोनों हाथों से खोल करक उसकी मदन-मणि के दाने को चूसने लगा। वो तो आहहह... उहह्हह करती ही रह गई। उसने कहा "ओह... क्या कर रहे हो जीजू ओफ्फ्फ.. इसे साफ तो करने दो। ओह गन्दे बच्चे ओईईईई.. माँ..." चुदाई में कुछ भी गन्दा नहीं होता, े। "अरे प्यार में कुछ गन्दा नहीं होता" मैंने कहा। और फिर उसके किशमिश के दाने को चूसने लगा। निशा कितनी देर तक बर्दाश्त करती। उसकी चूत के मूत्र-छिद्र से हल्की सी पेशाब की धार फिर चालू हो गई जो मेरी ठोड़ी से होती हुई गले के नीचे गिर सीने से होती मेरे प्पू और आँडों को जैसे धोती जा रही थी। उसने मेरे सिर के बाल पकड़ लिए कसकर। मैं तो मस्त हो गया। जब उसका पेशाब बन्द हुआ तो उसने नीचे झुक कर मेरे होंठ चूम लिए और अपने होठों पर जीभ फिराने लगी। उसे भी अपनी मूत का थोड़ा सा नमकीन स्वाद ज़रूर मिल ही गया। हमने हल्का सा शॉवर लिया और साफ़-सफाई के बाद फिर बिस्तर पर आ गए। मैं बिस्तर पर टेक लगा कर बैठ गया। निशा अचानक उछली और मुझे एक तरफ लुढ़काते हुए मेरे पेट पर बैठ गई। उसकी दोनों टाँगें मेरे पेट के दोनों तरफ थी और उसके घुटने मुड़े हुए थे। उसने अपने होंठ मेरे होठों पर रख कर दो-तीन चुम्बन तड़ातड़ ले लिए। उसके सिन्दूरी आम मेरे सीने से लगे थे और उसके नितम्बों के नीचे मेरा पप्पू पीस रहा था। वो अपनी चूत और नितम्बों को भी थोड़ा-थोड़ा सा घिस रही ती। ऐसा करते हुए उसने अपनी जीभ की नोक से मेरी नाक चाटी और उसकी नोक अपने मुँह में लेकर चूसने लगी। आईलाआआआ... मैं तो मस्त ही हो गया।   
इस बात से आप सहमत हैं ना कि जब कोई लड़का या आदमी किसी लड़की या औरत को कहता है कि तुम बहुत ख़ूबसरूत हो तो इसका मतलब साफ़ होता है कि वह उसे चोदना चाहता है। दूसरी बात जब आदमी किसी लड़की के होंठ चूसता है तो वो मन में सोच रहा है कि ये उसकी चूत वाले होंठ ही हैं।

चार होंठ दो ऊपर और दो नीचे भाग 1

निशा ने बड़े नाज़-ओ-अन्दाज़ से अपनी ब्रा के हुक़ खोले और दोनों क़बूतर जैसे आज़ाद हो गए। गोर गुलाबी दो सिन्दूरी आम, जैसे रस से भरे हुए हों। चूचियों का गहरा घेरा कैरम की गोटी जितना बड़ा, बिल्कुल चुरूट लाल। घुण्डियाँ तो बस चने के दाने जितने। सुर्ख रतनार अनार के दाने जैसे, पेन्सिल की नोक की तरह तीखे। उसने अदा से अपने उरोजों पर हाथ फेरा और एक दाने को पकड़ कर मुँह की तरफ किया और उस पर जीभ लगा दी। या अल्लाह... मुझे लगा जैसे अब क़यामत ही आ जाएगी। उसने शीशे के सामने घुम कर अपने नितम्ब देखे। जैसे दो पूनम के चाँद किसी ने बाँध दिए हों। और उनके बीच की दरार एक लम्बी खाई की तरह। पैन्टी उस दरार में घुसी हुई थी। उसने अपने नितम्बों पर एक हल्की सी चपत लगाई और फिर दोनों हाथों को कमर की ओर ले जाकर अपनी काली पैन्टी नीचे सरकानी शुरु कर दी। 
मुझे लगा कि अगर मैंने अपनी निगाहें वहाँ से नहीं हटाईं तो आज ज़रूर मेरा हार्ट फेल हो जाएगा। जैसे ही पैन्टी नीचे सरकी हल्के-हल्के मक्के के भुट्टे के बालों जैसे रेशमी नरम छोटे-छोटे रोयें जैसे बाल नज़र आने लगे। उसके बाद दो भागों में बँटे मोटे-मोटे बाहरी होंठ, गुलाबी रंगत लिए हुए। चीरा तो मेरे अंदाज के मुताबिक ३ इंच से तो कतई ज़्यादा नहीं था। अन्दर के होंठ बादामी रंग के। लगता है साली ने अभी तक चूत (माफ़ करें बुर) से सिर्फ मूतने का ही काम लिया है। कोई अंगुल बाज़ी भी लगता है नहीं की होगी। अन्दर के होंठ बिल्कुल चिपके हुए - आलिंगनबद्ध। और किशमिश का दाना तो बस मोती की तरह चमक रहा था। गाँड की छेद तो नज़र नहीं आई पर मेरा अंदाजा है कि वो भी भूरे रंग का ही होगा और एक चवन्नी के सिक्के से अधिक बड़ा क्या होगा! दाईं जाँघ पर एक छोटा सा तिल। उफ्फ... क़यामत बरपाता हुआ। उसने शीशे में देखते हुए उन रेशमी बालों वाली बुर पर एक हाथ फेरा और हल्की सी सीटी बजाते हुए एक आँख दबा दी। मेरा पप्पू तो ऐसे अकड़ गया जैसे किसी जनरल को देख सिपाही सावधान हो जाता है। मुझे तो डर लगने लगा कि कहीं ये बिना लड़े ही शहीद न हो जाए। मैंने प्यार से उसे सहलाया पर वह मेरा कहा क्यों मानने लगा। और फिर नज़ाक़त से वो हल्के-हल्के पाँव बढ़ाते हुए शावर की ओर बढ़ गई। पानी की फुहार उसके गोरे बदन पर पेट से होती हुई उसकी बुर के छोटे-छोटे बालों से होती हुई नीचे गिर रही थी, जैसे वो पेशाब कर रही हो। मैं तो मुँह बाए देखता ही रह गया। वो गाती जा रही थी "पानी में जले मेरा गोरा बदन..." मैं सोच रहा था आज इसे ठण्डा मैं कर ही दूँगा, घबराओ मत। कोई १० मिनट तक वो फव्वारे के नीचे खड़ी रही, फिर उसने अपनी बुर को पानी से धोया। उसने अपनी उँगलियों से अपनी फाँकें धीरे से चौड़ी कीं जैसे किसी तितली ने अपने पंख उठाए हों। गुलाबी रंग की नाज़ुक सी पंखुड़ियाँ। किशमिश के दाने जितनी मदन-मणि (टींट), माचिस की तीली जितना मूत्र-छेद और उसके एक इंच नीचे स्वर्ग का द्वार, छोटा सा लाल रतनार। मुझे लगा कि मैं तो गश खाकर गिर ही पड़ूँगा। उसने शावर बन्द कर दिया और तौलिये से शरीर पोंछने लगी। जब वह अपने नितम्ब पोंछ रही थी, एक हल्की सी झलक उसकी नर्म नाज़ुक गाँड की छेद पर भी पड़ ही गई। उफ्फ... क्या क़यामत छुपा रखी थी उसने। अपनी बगलें पोंछने के लिए जब उसने अपनी बाहें उठाईं तो मैं देखकर दंग रह गया। काँख में एक भी बाल नहीं, बिल्कुल मक्खन जैसी चिकनी साफ सुराही गोरी चिट्टी। अब मैं उसे हुस्न कहूँ, बिजली कहूँ, पटाखा कहूँ या क़यामत... अब उसने बिना ब्रा और पैन्टी के ही शर्ट (टॉप) और बॉटम पहनना चालू कर दिया। बेल बॉटम पहनते समय मैंने एक बार फिर उसकी चूत पर नज़र डाली। लाल चुकन्दर जितनी छोटी सी, प्यारी सी चूत अब वहाँ रुकने का कोई मतलब नहीं रह गया था। .
मैं सोफ़े पर बैठ गया। जैसी ही बाथरूम का दरवाज़ा खुला गीले बालों से टपकती शबनम जैसी बूँदे, काँपते होंठ, क़मसिन बदन, बेल-बॉटम में कसी पतली-पतली जाँघों के बीच फँसी बुर का इतिहास और भूगोल यानी चीरा और फाँकें साफ़ महसूस हो रही थी। हे भगवान क्या फुलझड़ी है, पटाखा है, या कोई बम है। एक जादुई रोशनी से जैसे पूरा ड्राईंग-रूम ही भर उठा। अचानक एक बार जोर की बिजली कड़की और एक तेज धमाके के साथ पूरे मुहल्ले की लाईट चली गई। हॉल में घुप्प अँधेरा छा गया। उसके साथ ही डर के मार निशा की चीख सी निकल गई, "जीजू, ये क्या हुआ?" वो लगभग दौड़ती हुई फिर मेरी ओर आई। इस बार वह टकराई तो नहीं पर उसकी गरम साँसें मैं अपने पास ज़रूर महसूस कर रहा था। "कौन सा उत्पाद लाँच कर रही हो?" "दो उत्पाद हैं, एक तो गर्भाधान रोकने की गोली है, महीने में सिर्फ एक गोली और दूसरा बच्चों के अँगूठा चूसने और दाँतों से नाख़ून काटने की आदत से छुटकारा दिलाने की दवाई है, जिसे नाखूनों पर लगाया जाता है।" "हे भगवान तुम सब लोग हमारी रोज़ी-रोटी छीन लेने पर तुले हो।" "क्या मतलब?? हम तो बिज़नेस के साथ-साथ समाज सेवा भी कर रहे हैं।" निशा ने हैरानी से पूछा वो बात-बात में 'क्या मतलब' ज़रूर बोलती है। "अरे भाई साफ़ बात है, तुम गर्भधारण रोकने की दवा की मार्केटिंग करती हो तो बच्चे कहाँ से पैदा होंगे और फिर हमारे उत्पाद जैसे बच्चों का दूध, बच्चों का आहार, बच्चों के तेल, नैप्पी, पावडर, साबुन कौन खरीदेगा?" "और वो अँगूठा चूसने की आदत छुड़ाने की दवाई?" "वो भी हम जैसे प्रेमियों के ऊपर उत्याचार ही है।" "क्या... मत...लब?" निशा मेरा मुँह देखने लगी। "शादी के बाद वो आदत अपने-आप छूट जाती है... उसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ती। शादी के बाद भला कौन उसे अँगूठा चूसने देता है..." मैंने हँसते हुए कहा। कोई २५-३० मिनट के बाद निशा बेडरूम की ओर आई। उसकी आँखों में लाल डोरे तैर रहे थे। होश उड़े हुए, चाल में लड़खड़ाहट, होंठ सूखे हुए। वो तो बस इतनी ही बोल पाई, "जीजू क्या कर रहे हो?" शायद अपनी उखड़ी साँसों पर क़ाबू पाना चाहती थी। अब तो उसके चेहरे का रंग देखने लायक था। "ननन... नहीं तो.." "कोई बात नहीं पर तुम इतना घबराती क्यों हो?" "वो.. वो बिजली कड़क रही है ना" अजीब संयोग था कि उसी समय ज़ोर से बिजली फिर कड़की थी। बाहर अब भी पानी बरस रहा था। मैं जानता था कि वो कौन सी बिजली की बात कर रही है। वो मेरे पास आकर बैठ गई। "नहीं ये ग़लत है नीचे के होंठ थोड़े मोटे होते हैं। मेरे होंठ ज़रा ध्यान से देखो, नीचे का मोटा है या नहीं?" निशा अपने मुँह वाले होंठों की बात ही समझ रही थी, उसे क्या पता कि मैं तो चूत के होंठों की बात कर रहा था। "अरे मैं मुँह के होंठों की नहीं दूसरे होठों की बात कर रहा था। अच्छा चलो बताओ औरतें ज़्यादा बातें क्यों करतीं हैं?" मैंने पूछा। क्यों...?" उसने आँखें तरेरते हुए पूछा। वो अब मेरी बात का मतलब कुछ-कुछ समझ रही थी। "अरे भाई उनके चार होंठ होते हैं ना। दो ऊपर और दो नीचे" मैंने हँसते हुए कहा। "क्या मतलब..." उसकी निगाह झट से अपनी चूत की ओर चली गई, वहाँ तो अब चूत-रस की बाढ़ ही आ गई थी. उसने झट से तकिया अपनी गोद में रख लिया और फिर बोली, "ओह जीजू, आख़िर तुम अपनी औक़ात पर आ ही गए... मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी। अकेली मज़बूर लड़की जानकर उसे तंग कर रहे हो। मुझे नींद आ रही है।" वो नाराज़ सी हो गई। मैं जानता था साली गरम हो चुकी है। उसकी चूत ने दनादन पानी छोड़ना शुरु कर दिया है और अब तो पानी रिस कर उसकी गाँड को भी तर कर रहा होगा। अब तो बस दिल्ली दो क़दम की दूर ही रह गई है। मेरा अनुभव कहता है कि इस तरह की बात के बाद लड़की इतनी ज़ोर से नाराज़ हो जाती है कि बवाल मचा देती है, पर निशा तो बस सोने की ही बात कर रही थी. मैंने बात आगे बढ़ाते हुए कहा

जल्दी करो मेरे छेद से ही डाल लो न...भाग 3

और उसमें से रास्ता बनाने के लिए धीरे-धीरे सलवार को कुरेदने लगा...योजना रानी को भा गयी...उसने खुद ही सूट ठीक करने के बहाने अपनी सलवार में हाथ डालकर नीचे से थोड़ी सी सिलाई उधेड़ दी...लेकिन आशीष को ये बात तब पता चली...जब कुरेदते-कुरेदते एकदम से उसकी अंगुली सलवार के अन्दर दाखिल हो गयी...ज्यों-ज्यों रात गहराती जा रही थी...यात्री खड़े-खड़े ही ऊँघने से लगे थे...आशीष ने देखा...कृष्णा भी खड़ी-खड़ी झटके खा रही है... आशीष ने भी किसी सज्जन पुरुष की तरह उसकी गर्दन के साथ अपना हाथ सटा दिया...कृष्णा देवी ने एक बार आशीष को देखा फिर आँखें बंद कर ली...आशीष अब खुल कर खतरा उठा सकता था...उसने अपने लंड को उसकी गांड की दरार से निकाल कर सीध में दबा दिया और रानी के बनाये रस्ते में से उंगली घुसा दी...अंगुली अन्दर जाकर उसकी कच्छी से जा टकराई!आशीष को अब रानी का डर नहीं था...उसने एक तरीका निकला...रानी की सलवार को ठोडा ऊपर उठाया...उसको कच्ची समेत सलवार पकड़ कर नीचे खीच दी...कच्छी थोड़ी नीचे आ गयी और सलवार अपनी जगह पर...ऐसा करते हुए आशीष खुद के दिमाग की दाद दे रहा था...हींग लगे न फिटकरी और रंग चौखा...रानी ने कुछ देर ये तरीका समझा और फिर आगे का काम खुद संभल लिया...जल्द ही उसकी कछी उसकी जांघो से नीचे आ गयी...अब तो बस हमला करने की देर थी...आशीष ने उसकी गुदाज जांघो को सलवार के ऊपर से सहलाया; बड़ी मस्त और चिकनी थी...उसने अपने लंड को रानी की साइड से बहार निकल कर उसके हाथ में पकड़ा दिया...रानी उसको सहलाने लगी...आशीष ने अपनी उंगली इतनी मेहनत से बनाये रास्तों से गुजार कर उसकी चूत के मुंहाने तक पहुंचा दी...रानी सिसक पड़ी... अब उसका हाथ आशीष के मोटे लंड पर जरा तेज़ी से चलने लगा... उत्तेजित होकर उसने रानी को आगे से पीछे दबाया और अपनी अंगुली गीली हो चुकी छूट के अन्दर घुसा दी...रानी चिल्लाते-चिल्लाते रुक गयी...आशीष निहाल हो गया...उसने धीरे-धीरे जितनी खड़े-खड़े जा सकती थी उतनी उंगली घुसाकर अन्दर बहार करनी शुरू कर दी...रानी के हाठों की जकदन बढ़ते ही आशीष समझ गया की उसकी अब बस छोड़ने ही वाली है...उसने लंड अपने हाथ में पकड़ लिया और जोर-जोर से हिलाने लगा...रानी ने अपना दबाव पीछे की और बड़ा दिया ताकि भाभी पर उनके झटकों का असर कम से कम हो...और अनजाने में ही वह एक अनजान लड़के की उंगली से चुदवा बैठी...पर यात्रा अभी बहुत बाकी थी...उसने पहली बार आशीष की तरफ देखा और मुस्कुरा दी! अचानक आशीष को धक्का लगा और वो हडबडा कर परे हट गया... आशीष ने देखा उसकी जगह करीब 45-46 साल के एक काले कलूटे आदमी ने ले ली...आशीष उसको उठाकर फैंकने ही वाला था की उस आदमी ने धीरे से रानी के कान में बोला,"चुप कर के खड़ी रहना साली... मैंने तुझे इस लम्बू से मजे लेते देखा है...ज्यादा हिली तो सबको बता दूंगा...सारा डिब्बा तेरी गांड फाड़ डालेगा कमसिन जवानी में...!"वो डर गयी उसने आशीष की और देखा...आशीष पंगा नहीं लेना चाहता था;और दूर हटकर खड़ा हो गया...उस आदमी का जायजा अलग था...उसने आगे हिम्मत दिखाते हुए रानी की कमीज में हाथ दाल दिया...रानी पूरा जोर लगा कर पीछे हट गयी; कहीं भाभी न जाग जाये...उसकी गांड उस कालू के खड़े होते हुए लंड को और ज्यादा महसूस करने लगी...रानी का बुरा हाल था...कालू उसकी चूचियां को बुरी तरह उमेठ रहा था...उसने निप्पलों पर नाखोन गड़ा दिए...रानी विरोध नहीं कर सकती थी... एकाएक उस काले ने हाथ नीचे ले जाकर उसकी सलवार में डाल दिया... ज्यों ही उसका हाथ रानी की चूत के मुहाने पर पहुंचा...रानी सिसक पड़ी...उसने अपना मुंह फेरे खड़े आशीष को देखा...रानी को मजा तो बहुत आ रहा था पर आशीष जैसे सुन्दर छोकरे के हाथ लगने के बाद उस कबाड़ की छेड़-छाड़ बुरी लग रही थी...अचानक कालू ने रानी को पीछे खींच लिया...उसकी चूत पर दबाव बनाकर...कालू का लंड उसकी सलवार के ऊपर से ही रानी की चूत पर टक्कर मरने लगा...रानी गरम होती जा रही थी...अब तो कालू ने हद कर दी...रानी की सलवार को ऊपर उठाकर उसके फटे हुए छेद को तलाशा और उसमें अपना लंड घुसा कर रानी की चूत तक पहुंचा दिया...रानी ने कालू को कसकर पकड़ लिया...अब उसको सब कुछ अच्छा लगने लगा था...आगे से अपने हाथ से उसने रानी की कमसिन चूत की फानको को खोला और अच्छी तरह अपना लंड सेट कर दिया...लगता था जैसे सभी लोग उन्ही को देख रहे हैं...रानी की आँखें शर्म से झुक गयी पर वो कुछ न बोल पाई...कहते हैं जबरदस्ती में रोमांस ज्यादा होता है...इसको रानी का सौभाग्य कहें या कालू का दुर्भाग्य...गोला अन्दर फैकने से पहले ही फट गया...कालू का सारा माल रानी की सलवार और उसकी चिकनी मोटी जाँघों पर ही निकल गया...! कालू जल्द ही भीड़ में गुम हो गया...रानी का बुरा हाल था...उसको अपनी चूत में लंड का खालीपन लगा...ऊपर से वो कालू के रस में सारी चिपचिपी सी हो गयी...गनीमत हुयी की जयपुर स्टेशन आ गया...वरना कई और भेढ़िये इंतज़ार में खड़े थे...अपनी-अपनी बारी के...जयपुर रेलवे स्टेशन पर वो सब ट्रेन से उतर गए...रानी का बुरा हाल था...वो जानबुझकर पीछे रह रही थी ताकि किसी को उसकी सलवार पर गिरे सफ़ेद धब्बे न दिखाई दे जाये...आशीष बोला,"ताऊजी, कुछ खा पी लें!बहार चलकर..."ताऊ पता नहीं किस किस्म का आदमी था,"बोला भाई जाकर तुम खा आओ! हम तो अपना लेकर आये हैं...कृष्णा ने उसको दुत्कारा"आप भी न बापू!जब हम खायेंगे तो ये नहीं खा सकता... हमारे साथ..."ताऊ-बेटी मैंने तो इसलिए कह दिया था कहीं इसको हमारा खाना अच्छा न लगे...शहर का लौंडा है न...हे राम!पैर दुखने लगे हैं..."आशीष-इसीलिए तो कहता हूँ ताऊजी...किसी होटल में चलते हैं... खा भी लेंगे...सुस्ता भी लेंगे...ताऊ-बेटा,कहता तो तू ठीक ही है...पर उसके लिए पैसे...आशीष-पैसों की चिंता मत करो ताऊजी...मेरे पास हैं...आशीष के ATM में लाखों रुपैये ठे...ताऊ-फिर तो चलो बेटा, होटल का ही खाते हैं...होटल में बैठते ही तीनो के होश उड़ गए...देखा रानी साथ नहीं थी...ताऊ और कृष्णा का चेहरा तो सफ़ेद जैसा हो गया... आशीष ने उनको तसल्ली देते हुए कहा"ताऊजी, मैं देखकर आता हूँ... आप तब तक यहीं बैठकर खाना खाईये...कृष्णा-मैं भी चलती हूँ साथ! ताऊ-नहीं! कृष्णा मैं अकेला यहाँ कैसे रहूँगा...तुम यहीं बैठी रहो...जा बेटा जल्दी जा...और उसी रस्ते से देखते जाना, जिससे वो आए थे...मेरे तो पैरों में जान नही है...नहीं तो मैं ही चला जाता...आशीष उसको ढूँढने निकल गया...आशीष के मन में कई तरह की बातें आ रही थी..."कही पीछे से उसको किसी ने अगवा न कर लिया हो!कही वो कालू..."वह स्टेशन के अन्दर घुसा ही था की पीछे से आवाज आई"भैया!"आशीष को आवाज सुनी हुयी लगी तो पलटकर देखा...रानी स्टेशन के परवेश द्वार पर सहमी हुयी सी खड़ी थी...आशीष जैसे भाग कर गया..."पागल हो क्या? यहाँ क्या कर रही हो?...चलो जल्दी..."रानी को अब शांति सी थी ..."मैं क्या करती भैया...तुम्ही गायब हो गए अचानक!""ए सुन! ये मुझे भैया-भैया मत बोल""क्यूँ?""क्यूँ! क्यूंकि ट्रेन में मैंने".....और ट्रेन का वाक्य याद आते ही आशीष के दिमाग में एक प्लान कौंध गया!"मेरा नाम आशीष है समझी! और मुझे तू नाम से ही बुलाएगी...चल जल्दी चल!"आशीष कहकर आगे बढ़ गया और रानी उसके पीछे-पीछे चलती रही...आशीष उसको शहर की और न ले जाकर स्टेशन से बहार निकलते ही रेल की पटरी के साथ-साथ एक सड़क पर चलने लगा...आगे अँधेरा था...वहां काम बन सकता था!"यहाँ कहाँ ले जा रहे हो, आशीष!"रानी अँधेरा सा देखकर चिंतित सी हो गयी...
"तू चुप चाप मेरे पीछे आ जा... नहीं तो कोई उस कालू जैसा तुम्हारी...जान गयी न...आशीष ने उसको ट्रेन की बातें याद दिला कर गरम करने की कोशिश की..."तुमने मुझे बचाया क्यूँ नहीं...इतने तगड़े होकर भी डर गए"रानी ने शिकायती लहजे में कहा..."अच्छा!याद नहीं वो साला क्या बोल रहा था...सबको बता देता..."रानी चुप हो गयी..."आशीष बोला,"और तुम खो कैसे गयी थी... साथ-साथ नहीं चल सकती थी...?"रानी को अपनी सलवार याद आ गयी..."वो मैं...!"कहते-कहते चुप हो गयी..."क्या?" आशीष ने बात पूरी करने को कहा..."उसने मेरी सलवार गन्दी कर दी...मैं झुक कर उसको साफ़ करने लगी...उठकर देखा तो...."आशीष ने उसकी सलवार को देखने की कोशिश की पर अँधेरा इतना गहरा था की सफ़ेद सी सलवार भी उसको दिखाई न दी...आशीष ने देखा...साइड वाले अतिरिक्त पटरी पर एक खली डिब्बा है...आशीष काँटों से होता हुआ उस रेलगाड़ी के डिब्बे की और जाने लगा..."ये तुम जा कहाँ रहे हो?,आशीष!""आना है तो आ जाओ...वरना भाड़ में जाओ...ज्यादा सवाल मत करो!"वो चुपचाप चलती गयी...उसके पास कोई विकल्प ही नहीं था...आशीष इधर-उधर देखकर डिब्बे में चढ़ गया...रानी न चढ़ी...वो खतरे को भांप चुकी थी," प्लीस मुझे मेरे बापू के पास ले चलो..."वो डरकर रोने लगी...उसकी सुबकियाँ अँधेरे में साफ़-साफ़ सुनाई पद रही थी..."देखो रानी! दरो मत, मैं वही करूँगा बस जो मैंने ट्रेन में किया था...फिर तुम्हे बापू के पास ले जाऊँगा!अगर तुम नहीं करोगी तो मैं यहीं से भाग जाऊँगा...फिर कोई तुम्हे उठाकर ले जाएगा और चोद चाद कर रंडी मार्केट में बेच देगा... फिर चुद्वाती रहना साडी उम्र..."आशीष ने उसको डराने की कोशिश की और उसकी तरकीब काम कर गयी...रानी को सारी उम्र चुदवाने से एक बार की छेड़छाड़ करवाने में ज्यादा फायदा नजर आया...वो डिब्बे में चढ़ गयी...डिब्बे में चढ़ते ही आशीष ने उसको लपक लिया...वह पागलों की तरह उसके मैले कपड़ों के ऊपर से ही उसको चूमने लगा...रानी को अछा नहीं लग रहा था...वो तो बस अपने बापू के पास जाना चाहती थी..."अब जल्दी कर लो न...ये क्या कर रहे हो?"आशीष भी देरी के मूड में नहीं था...उसने रानी के कमीज को उठाया और उसी छेद से अपनी ऊँगली रानी के पिछवाड़े से उसकी चूत में डालने की कोशिश करने लगा...जल्द ही उसको अपनी बेवकूफी का अहसास हुआ...वासना में अँधा वह ये तो भूल ही गया था की अब तो वो दोनों अकेले हैं...उसने रानी की सलवार का नाडा खोलने की कोशिश की...रानी सहम सी गयी..."छेद से ही डाल लो न...!""ज्यादा मत बोल...अब तुने अगर किसी भी बात को "न " कहा तो मैं यहीं छोड़ कर तभी भाग जाऊँगा...समझी!" आशीष की धमकी काम कर गयी...अब वो बिलकुल चुप हो गयी...आशीष ने सलवार के साथ ही उसके कालू के रस में भीगी कच्छी को उतार कर फैंक दिया कच्छी डिब्बे से नीचे गिर गयी...रानी नीचे से बिलकुल नंगी हो चुकी थी...आशीष ने उसको हाथ ऊपर करने को कहा और उसका कमीज और ब्रा भी उतार दी...रानी रोने लगी..."चुप करती है या जाऊ मैं!"

जल्दी करो मेरे छेद से ही डाल लो न...भाग 2

रानी की आवाज उसके चिकने गलों जैसी ही मीठी थी..आशीष ने एक बार फिर कृष्णा की चूचियों को अन्दर तक देखा... उसके लड में तनाव आने लगा...और शायद वो तनाव रानी अपनी गांड की दरार में महसूस करने लगी...रानी बार-बार अपनी गांड को लंड की सीधी टक्कर से बचने के लिए इधर-उधर मटकाने लगी...उसका ऐसा करना उसकी ही गोल मटोल गांड के लिए नुक्सान देह साबित होने लगा...लंड गांड से सहलाया जाता हुआ और अधिक सख्त होने लगा...और अधिक खड़ा होने लगा...पर रानी के पास ज्यादा विकल्प नहीं थे...वो दाई गोलाई को बचाती तो लड बायीं पर ठोकर मारता...और अगर बायीं को बचाती तो दाई पर उसको लंड चुभता हुआ महसूस होता...उसको एक ही तरीका अच्छा लगा...वो सीधी खड़ी हो गयी...पर इससे उसकी मुसीबत और भयंकर हो गयी...बिलकुल खड़ा होकर लंड उसकी गांड की दरारों के बीचों बीच फंस गया...वो शर्मा कर इधर-उधर देखने लगी...पर कुछ नहीं बोली...आशीष ने मन ही मन एक योजना बना ली...अब वो इनके साथ ज्यादा से ज्यादा रहना चाहता था..."मैं आपके बापू से बात करू;मेरे पास आरक्षण के चार टिकट हैं...मेरे और दोस्त भी आने वाले थे पर वो आ नहीं पाए!मैं भी जयपुर से उसी में जाऊँगा कल रात को करीब 10 बजे वो जयपुर पहुंचेगी...तुम चाहो तो आगे का मुझे साधारण किराया दे देना!"आशीष को डर था कि किराया न मांगने पर कहीं वो और कुछ न समझ बैठे...लम्बा हो होकर!...उसका लंड रानी कि गांड में घुसपैठ करता ही जा रहा था..."बापू!"जरा इधर कू आना!कृष्णा ने जैसे गुस्से में आवाज लगायी..."अरे मुश्किल से तो यहाँ दोनों पैर टिकाये हैं!अब इस जगह को भी खो दूं क्या?"बुद्धे ने सर निकाल कर कहा...रानी ने हाथ से पकड़ कर अन्दर फंसे लंड को बहार निकलने की कोशिश की पर उसके मुलायम हाथों के स्पर्श से ही लंड फुफकारा...कसमसा कर रानी ने अपना हाथ वापस खींच लिया...अब उसकी हालत खराब होने लगी थी...आशीष को लग रहा था जैसे रानी लंड पर टंगी हुयी है...उसने अपनी एडियों को ऊँचा उठा लिया ताकि उसके कहर से बच सके पर लंड को तो ऊपर ही उठाना था...आशीष की तबियत खुश हो गयी...!रानी आगे होने की भी कोशिश कर रही थी पर आगे तो दोनों की चूचियां पहले ही एक दुसरे से टकरा कर मसली जा रही थी...बेचारी रानी एड़ियों पर कब तक खड़ी रहती;वो जैसे ही नीचे हुयी, लंड और आगे बढ़कर उसकी चूत की चुम्मी लेने लगा...रानी की सिसकी निकाल गयी...,"आःह्ह!""क्या हुआ रानी?"कृष्णा ने उसको देखकर पूछा..."कुछ नहीं भाभी!"तुम बापू से कहो न भैया से आरक्षण वाला टिकट लेने के लिए!"आशीष को भैया कहना अच्छा नहीं लगा... आखिर भैया ऐसे गांड में लंड थोडा ही फंसाते हैं...धीरे-धीरे रानी का बदन भी बहकने सा लगा...आशीष का लंड अब ठीक उसकी चूत के दाने पर टिका हुआ था..."बापू"कृष्णा चिल्लाई..."बापू" ने अपना मुंह इस तरफ निकला, इस तरह खड़े होने के लिए आशीष को घूरा, और फिर भीड देखकर समझ गया की आशीष तो उनको उल्टा बचा ही रहा है," क्या है बेटी?"कृष्णा ने घूंघट निकल लिया था,"इनके पास जयपुर से आगे के लिए आरक्षण की टिकट हैं;इनके काम की नहीं हैं...कह रहे हैं सामान्य किराया लेकर दे देंगे!"उसके बापू ने आशीष को ऊपर से नीचे तक देखा;संतुस्ट होकर बोला,"हम गरीबों पर ये बड़ा उपकार होगा...किराया सामान्य का ही लोगे न!"आशीष ने खुश होकर कहा," ताऊजी मेरे किस काम की हैं...मुझे तो जो मिल जायेगा...फायदे का ही होगा..."कहते हुए वो दुआ कर रहा था की ताऊ को पता न हो की टिकट वापस भी हो जाती हैं..."ठीक है भैया...जयपुर उतर जायेंगे...बड़ी मेहरबानी!"कहकर भीड़ में उसका मुंह गायब हो गया...आशीष का ध्यान रानी पर गया वो धीरे-धीरे आगे पीछे हो रही थी...उसको मजा आ रहा था...कुछ देर ऐसे ही होते रहने के बाद उसकी आँखें बंद हो गयी...
और उसने कृष्णा को जोर से पकड़ लिया..."क्या हुआ रानी?"...सँभलते हुए वह बोली..."कुछ नहीं भाभी चक्कर सा आ गया था...अब तक आशीष समझ चूका था कि रानी चुदाई के मुफ्त में ही मजे ले गयी...उसका तो अब भी ऐसे ही खड़ा था...एक बार आशीष के मन में आई कि टोइलेट में जाकर मुठ मार आये...पर उसके बाद ये ख़ास जगह खोने का डर था... अचानक किसी ने लाइट के आगे कुछ लटका दिया जिससे आसपास अँधेरा सा हो गया...रानी कि गांड में लंड वैसे ही अकड़ा खड़ा था;जैसे कह रहा हो...अन्दर घुसे बिना नहीं मानूंगा मेरी रानी!लंड के धक्को और अपनी चूचियों के कृष्णा भाभी की चूचियों से रगड़ खाते-खाते वो जल्दी ही फिर लाल हो गयी...इस बार आशीष से रहा नही गया...कुछ तो रौशनी कम होने का फायदा...कुछ ये विश्वास की रानी मजे ले रही है... उसने थोडा सा पीछे हटकर अपने पेन्ट की जिप खोल कर रानी की गांड की घटी में खुला चरने के लिए अपने घोड़े को खुला छोड़ दिया...रानी को इस बार ज्यादा गर्मी का अहसास हुआ...उसने अपने नीचे हाथ लगा कर देखा की नीचे से कहीं गीली तो नहीं हो गयी;और जब मोटे लंड की मुंड पर हाथ लगा तो वो उचक गयी...अपना हाथ हटा लिया...और एक बार पीछे देखा...आशीष ने महसूस किया,उसकी आँखों में गुस्सा नहीं था...भाभी का और दूसरी सवारियों के देख लेने का थोडा डर जरुर था...थोड़ी देर बाद उसने धीरे-2 करके अपना कमीज पीछे से निकल दिया...अब लंड और चूत के बीच में दो दीवारें थी...एक तो उसकी सलवार और दूसरा उसकी कच्छी...आशीष ने हिम्मत करके उसकी गांड में अपनी उंगली डाल दी

जल्दी करो मेरे छेद से ही डाल लो न...! भाग 1

रेलवे स्टेशन पर भारी भीड़ थी; आने वालों की भी और जाने वालों की भी. तभी स्टेशन पर घोषणा हुई," कृपया ध्यान दें, दिल्ली से मुंबई को जाने वाली न्यू गंगा एक्सप्रेस 24 घंटे लेट है" सुनते ही आशीष का चेहरा फीका पढ़ गया...कहीं घर वाले ढूँढ़ते रेलवे स्टेशन तक आ गए तो... मुंबई के लिए उसने 3 दिन पहले ही आरक्षण करा लिया था...पर घोषणा सुनकर तो उसके सारे प्लान का कबाड़ा हो गया...हताशा में उसने चलने को तैयार खढी एक पस्सेंजेर ट्रेन की सीटी सुनाई दी...हडबडाहट में वह उसकी और भागा...अन्दर घुसने के लिए आशीष को काफी मशक्कत करनी पड़ी...अन्दर पैर रखने की जगह भी मुश्किल से थी...सभी खड़े थे...क्या पुरुष और क्या औरत...सभी का बुरा हाल था और जो बैठे थे; वो बैठे नहीं थे...लेटे थे...पूरी सीट पर कब्ज़ा किये...आशीष ने बाहर झाँका; उसको डर था...घरवाले आकर उसको पकड़ न लें; वापस न ले जाएं उसका सपना न तोड़ दें...हीरो बनने का! हीरो बनने के लिए आशीष घर से भाग कर आया था...शकल सूरत से हीरो ही लगता था कद में अमिताभ जैसा; स्मार्टनेस में अपने सल्मान जैसा...बॉडी में गजनी वाला आमिर खान लगता था और एक्टिंग में शाहरुख़ खान...वो इन सबका दीवाना था...इसके साथ ही हेरोइंस का भी...उसने सुना था...एक बार कामयाब हो जाओ फिर सारी जवान हसीन माडल्स, हीरो और निर्देशक के नीचे ही रहती हैं...बस यही मकसद था उसका हीरो बनने का ...रेल गाढ़ी के चलने पर उसने रहत की सांस ली...हीरोगिरी के सपनों में खोये हुए आशीष को अचानक पीछे से किसी ने धक्का मारा...वो चौंक कर पीछे पलटा..."देखकर नहीं खड़े हो सकते क्या भैया...बुकिंग करा रखी है क्या?"आशीष देखता ही रह गया...गाँव की लगने वाली एक अल्हड़ जवान युवती उसको झाड पिला रही थी...उम्र करीब 22 साल होगी...चोली और घाघरे में ब्याहता लगती थी...छोटे कद की होने की वजह से आशीष को उसकी श्यामल रंग की चूचियां काफी अन्दर तक दिखाई दे रही थी...चूचियों का आकार ज्यादा बड़ा नहीं था, पर जितना था मनमोहक था...आशीष उसकी बातों पर कम उसकी छलकती हुई मस्तियों पर ज्यादा ध्यान दे रहा था...उस अबला की पुकार सुनकर भीड़ से करीब 45 साल के एक आदमी ने सर निकल कर कहा,"कौन है बे?" पर जब आशीष के डील डौल को देखा तो उसका सुर बदल गया,"भाई कोई मर्ज़ी से थोड़े ही किसी के ऊपर चढ़ना चाहता है..." उसकी बात पर सब ठाहाका लगाकर हंस पडे...तभी भीड़ से एक बूढ़े की आवाज आई," कृष्णा! ठीक हो बेटी "पल्ले से सर ढकते उस 'कृष्णा ' ने जवाब दिया," कहाँ ठीक हूँ बापू!" और फिर से बद्बदाने लगी," अपने पैर पर खड़े नहीं हो सकते क्या?"आशीष ने उसके चेहरे को देखा...रंग गोरा नहीं था पर चेहरे के नयन-नक्श तो कई हीरोइनों को भी मात देते थे...गोल चेहरा, पतली छोटी नाक और कमल की पंखुड़ियों जैसे होंट...आशीष बार-बार कन्खियों से उसको देखता रहा...तभी कृष्णा ने आवाज लगायी,"रानी ठीक है क्या बापू? वहां जगह न हो तो यहाँ भेज दो...यहाँ थोड़ी-सी जगह बन गयी है..."और रानी वहीं आ गयी...कृष्णा ने अपने और आशीष के बीच रानी को फंसा दिया...रानी के गोल मोटे चूतड आशीष की जांघों से सटे हुए थे...ये तो कृष्णा ने सोने पर सुहागा कर दिया...अब आशीष कृष्णा को छोड़ रानी को देखने लगा...उसके लट्टू भी बढे-बढे थे...उसने एक मैली सी सलवार-कमीज डाल राखी थी...उसका कद भी करीब 5' 2" होगा... कृष्णा से करीब 2" लम्बी! उसका चहरा भी उतना ही सुन्दर था और थोड़ी सी लाली भी झलक रही थी...उसके जिस्म की नक्काशी मस्त थी...कुल मिला कर आशीष को टाइम पास का मस्त साधन मिल गया था...रानी कुंवारी लगती थी...उम्र से भी और जिस्म से भी...उसकी छातियाँ भारी-भारी और कसी हुई गोलाई लिए हुए थी...नितम्बों पर कुदरत ने कुछ ज्यादा ही इनायत बक्षी थी...आशीष रह-रह कर अनजान बनते हुए उसकी गांड से अपनी जांघें घिसाने लगा...पर शायद उसको अहसास ही नहीं हो रहा था...या फिर क्या पता उसको भी मजा आ रहा हो!अगले स्टेशन पर डिब्बे में और जनता घुश आई और लाख कोशिश करने पर भी कृष्णा अपने चारों और लफ़ंगे लोगों को सटकर खड़ा होने से न रोक सकी...उसका दम घुटने सा लगा...एक आदमी ने शायद उसकी गांड में कुछ चुभा दिया...वह उछल पड़ी...क्या कर रहे हो?दिखता नहीं क्या?""ऐ मैडम; ज्यास्ती बकवास नहीं मारने का;ठंडी हवा का इतना इच शौक पल रैल्ली है...तो अपनी गाड़ी में बैठ के जाने को मांगता था..."आदमी बिघढ़ कर बोला और ऐसे ही खड़ा रहा...कृष्णा एकदम दुबक सी गयी...वो तो बस आशीष जैसों पर ही डाट मार सकती थी...कृष्णा को मुश्टंडे लोगों की भीड़ में आशीष ही थोडा शरीफ लगा...वो रानी समेत आशीष के साथ चिपक कर कड़ी हो गई, जैसे कहना चाहती हो,"तुम ही सही हो, इनसे तो भगवन बचाए!"आशीष भी जैसे उनके चिपकने का मतलब समझ गया;उसने पलट कर अपना मुंह उनकी और कर लिया और अपनी लम्बी मजबूत बाजू उनके चारों और बैरियर की तरह लगा दी...कृष्णा ने आशीष को देखा;आशीष थोड़ी हिचक के साथ बोला,"जी उधर से दबाव पड़ रहा है...आपको परेशानी ना हो इसीलिए अपने हाथ सीट से लगा लिए..."कृष्णा जैसे उसका मतलब समझी ही ना हो...उसने आशीष के बोलना बंद करते ही अपनी नजरें हटा ली...अब आशीष उसकी चुचियों को अन्दर तक और रानी की चूचियों को बहार से देखने का आनंद ले रहा था...कृष्णा ने उनको अब आशीष की नजरों से बचने की कोशिश भी नहीं की..."कहाँ जा रहे हो?..."कृष्णा ने लोगों से बचने के लिए धन्यवाद् देने की खातिर पूछ लिया..."मुंबई"आशीष उसकी बदली आवाज पर काफी हैरान ठा..."और तुम?""भैया जा तो हम भी मुंबई ही रहे हैं...पर लगता नहीं की मुंबई तक पहुँच पायेंगे...!"कृष्णा अब मीठी आवाज में बात कर रही थी..."क्यूँ ?"आशीष ने बात बाधा दी!"अब इतनी भीड़ में क्या भरोसा!"मैंने कहा है बापू को जयपुर से तत्काल करा लो; पर वो माने तब न!""भाभी!बापू को ऐसे क्यूँ बोलती हो?"

Lund Aur Chudai Ki Diwani Hoo Mai

Dosto lund ki diwani ladki hoo aur mai kamyaab zindagi usi me samajhti hoo jo zindagi bhar bharpoor chudai ka maja le sake, duniya ke ladai jhagde me kuch nahi rakha hai, mari chut to lund aur usse hone wali chudai ke bare me sochkar hi khil uthti hai, chut ke liye lund hi sub kuch hota hai, phir wo lund chahe kisi ka bhi ho, chut me ghusega to maja dega hi, chahe wo baap ka, ho ya bhai ka, bete ka, boyfriend ka ho, ya pati ka ya kisis aur ka, maja to chut ko ayega hi.
Chudai karo aur karwao aur chudai ke liye hi jiyo aisa mera sochna hai, mai to chahti ho ke mujhe tarah tarah ke lund chakhne ko mele to maja aa jaye. Subah saham meri chut chudai aur lund ke naam hi japti hai.

halanki abhi mai BA ki padhadi ker rahi hoo, lekin mera aage ka plan porn star baane ka hai, aaj kal inki badi dimand hai, filmo se lekar har jagah ijjat bhi kaafi milti hai aur paisa bhi. kitna aasan hai, chud aur gand dikhao aur dhero paise kamao aur sath me maje ko to kya kehne. aur kya chahiye life me mujhe, lund aur paisa.

Aage jaldi hi mai apni hone waali chudaiyo ki kahani aur ghatano ke baare nme likhung, tab tak thora intezar karo aapki apni lund ki pyaasi..

Aane wali nai kahaniya

  • बीवी का पेशाब पिए बिना घर से बाहर नहीं जात. 
  • बाप से चुद कर माँ बनी 
  • बाप के लोडे से चुदे बिना ज़िन्दगी बेकार सी लगती है 
  • बेटी के सामने उसके पति से चुदाई हूँ 
  • बाप  के लोडे कर रस पी कर मैं जवान हुई 
  • दहेज़ में सास और साली को जिंदगी भर छोड़ने का ऑफर मिला 
  • सईयाँ चोद चोद चोद ओ सैयाँ चोद 
  • पति के लोडे का रस फेस वाश के जगह रोज इस्तेमाल करती हूँ 
  • गर्लफ्रेंड के मूत को पीता हूँ तो जोश दुगना हो जाता है 
  • चूत और चूत में प्य़ार 

Ma Ko Chode ker Pregnent Kia

Baat tab ki hai jab maine apni maa ki chut me apne 9.5 inch ke laude ko daal ke use khoob choda aur uske baad meri maa mere laude se chud ker wo meri beti ki ma bani, Maine apni maa ko chod 13 saal ki umar me hi chod liya, darasal mere pariwar me kewal mai aur meri maa hai. meri maa ne muje paal ke bada kia, hamari property thi jisme 4 manjil ke 3 bedroom plat the ussi ko kiraye pe de kar hamara gujar basa hua. mai jab 12 saal ka hua to sex ki taraf bahoot akarshit tha, meri ma ko bhi land mile kaafi wakt ho gaya tha, aur jawani bhi abhi bharpoor thi. unki shadi 13 saal ki umar me hi ho gai thi, aur 16 saal ki umar me mai paida hua, papa ne kisi aur bade ghar ki ladki ke chakkar me hame chod dia, tab se hum maa bete akele hi hai, Ma ka akelapan aur us per unki jawani ne mujhe unki taraf akarshit kia, aur ma ko kai baar bathroom me ched se nanghi nahate dekha aur mera lund unki taraf bahoot akarshit ho gaya, hum dono sath hi sote the. ek hi bistar par, ek din maine unnhe chodne ka plan banaya, mai ghar me payjama ya half nikkar hi pehanta hoo, maine apne sabhi payjaame ke naade dheele kar giya aur payejame ke saath nikkar bhi dheeli ker di aur saath me neche se sabhi ki silayi tod de jissne baithne per mera lund aur pelhar bahar nikal ate the. mai aksar unke saame aise bath-ta jisse ke mare lund aur pelhar us ched me se dekhai de aur bahar bhi nikal aye. maa kai baar dekhti aur kehti ke tum jao dusra payjama pehno ye fati hui hai. mai unki baat sun kar payjama badal deta lekin sabhi payjame aur nikkar me to maine maine pehle se si selai tod di hai. Ma agar unki silai bhi ker deti to mai kuch din me phir se silai dheli karke tode deta. maine apni payjame aur nikkar dhele bhi ker diya the, jisse night me jab hu sath sote the to mai night me janboojhker apni nikkar aur payjame ko neeche sarka kar so jaata the. aur subah hone ka ya unke uthne ka intezaar karta rehta.. jisse ke jab wo uthe unne meri nikkar niche khiski hui dikhe. aur unne mera lund aur pelhar dikhai de. mera lund subah unke uthne aur use dekhne ko lekar lagbhar khada hi rehta. aur subah jab unke uthen ka time hota mai aur mera lun pehle se hi unke uthne ka intejar karta rehta. mai jhooth mooth ka aknhe band karke leta rehta ke unko lage ke mai so raha hoo. jab wo uthi aur mera lund aur pelhar dekha wo unki nazar us pr ek baat to tik gai. aur kaafi jhep gai. aur unki nazar mere chere pe gai. mai to ankhe band kiya so raha tha. mere lund pe jhate aur us per mere itne bade khad lund ko dekhkar wo sakpaka gai, wo thi aur chali gai waha se. mai ankhe band kiye usi mudra me pada raha aur aage ke bare pe sochne laga ke unka reaction ab kya hoga. meri aage ki plannig ab yai thi ke unne kisi na kisi bahane ab roj kai baar apne lun aur pehlar ka deedar kara kara maje leta raho. isi tarah ab mai lagbhag roj hi karne laga, ab subah subah maa ko mere lode ke darshan kara kara ker maje lene laga, aur dine me apne chaddi aur payjame ke ched se lode aur pelhar is position mai baithta ke wo bahar nikal aye baithte hi. unnone kai baar mere payjame ke dheele nade ko tight kiya aur nai dress lakar di, aur tooti silai ko sil bhi dia lekin mai phir kuch din me use waisa hi kar deta tha. aise hi kuch mahino tak chalta raha unnhone mujhe kai baar data ke thik se pehna karu kapde. lekin mai waise hi karta raha. ab unne mera nikkar ke ched se lund ke bahar niklne aur subah subah khade lund ko dekhne ki adat ho gai aur ab hum dono ma bete ke liye ek normal baat ho gai. to maine ise aur aage badhane ki sochi. ek din mera lund aur pelhar aise hi subah subah khule hue the. jab maa uthi to unka dhyaan us per gaya. kuch der dekhti rahi. aur achanak apna hath badhakar mere lund ko pakarlia. use sehlane lagi. mujhe maja aane laga. maine achanak nind tootne ka natak kia. to unhone use chod dia. aur waha se jaldi se uth kar chali gai.agle din wo phir mere lund ko pakadkar sahlane lagi. apko baar mai nahi utha. kuch der use shelaya phir wo waha se chali gai. ab mujhe yakeen ho gaya ke mujhe aage ka plan shuru karna chahiye. ab mera lund hamesha unki chudai ki soch kar khara hi rehata. aur ab to nikkar ya payjame ke ched se bahar nikal ke khara ho jata. ek din maa ne kaha beta tumhari chunni bahoot badi ho gai hai, jab tum paida hue the to choti si thi.
maine kaha sach me maa?
ma: ha beta.
maine use apne hath se pakar ke unhe dikhate hue kaha.
Mai: ma ye kitni choti thi..
ma ne use pakar kar bataya.
Ma: Beta tab ye jara si thi.
maine use upar niche karke ma ko dikhate hue kaha. ma ab ye kaisa lagta hai. ma ne kaha bete ab to ye kisi jawan aadmi ke jitne bada ho gaya hai. maine kaha sach me ma. iska matlab ke mai bada ho gaya hoo. ma ne kaha ha bete tum ab bade ho gaye ho. ma mere lund ke paas baal bhi hai. Ma ne kaha ha bete ye baal bade hone ki nishani hai. uske baad hum ma bete lund aur pelhar ko lekar kafi khul gaye aur mai ab aksar unke samne apni nikkar aur kapne nangha hokar badalne laga. aur ma ab mere lund aur pelhar ko pakar kar mere sath saharat bhi karne lagi thi. unke aisa karne se mera lund khara ho jata aur ma use hila hila kar mera rus nikal deti. maine bhi maa ko kai baar apni chu khol ker dikhane ko kaha lekin wo taal jaati. ek din jab wo mera lund hila rahi thi to mai unki chur dekhne ke liye zid karne laga. aur unhe kapde utane ke liye bola. wo maan gai aur mai unke kapde utarne laga.

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Aage pade kaise maine ma ko choda aur unhone apne bete se chud kar unski beti ko janam dia.
aur uske baad maine kaise meri beti ke 13 saal ke hone per use choda aur meri beti ne mujhse chudwa ker ek beti ko janam diya.....
maine 13 saal ki umar me apni maa ko choda. unnhone mere 14 saal ke hote hote meri beti ko paida kia. aur jab mei 28 saal ka hua tab meine apni beti ko chod ker uske bacche ka baap bana. ap meri planning hai.44 saal tak apni beti ki beti ko chod ker use bhi ek beti paida katu aur uske baad use bhi chod ker 58 -59 saal ki umar tak ek aur last baar phir beti ki beti ko chod ker uske beti ka baap banu....